NRC की पहली लिस्ट के कारण तनाव! लिस्ट में इस उग्रवादी का नाम शामिल लेकिन….

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आसाम: अवैध रूप से रह रहे लोगों को निकालने के लिए सरकार ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) का पहला ड्राफ़्ट जारी किया है. जब पूरा देश नए साल का जश्न मना रहा था, देश के उत्तर-पूर्वी राज्य असम के लोगों पर उम्मीद और आशंका दोनों के बादल मंडरा रहे थे।

NRC की पहली लिस्ट जारी हुई जिसके कारण असम में तनाव! इस लिस्ट में उल्फा उग्रवादी का..
बांग्लादेशी घुसपैठियें  Image Source 

असम सरकार ने आधी रात को नेशनल रजिस्टर आॅफ सिटिजन (NRC) का पहला ड्राफ्ट जारी किया, जिससे राज्य में रहने वाले कानूनी और गैरकानूनी नागरिकों की पहचान हाेगी. असम सरकार द्वारा जारी की गई पहली लिस्ट में 3.29 करोड़ लोगों में से केवल 1.9 करोड़ को ही भारत का वैध नागरिक माना गया है.

लेकिन विवाद इस बात को लेकर है कि बाकी बचे 1.39 करोड़ का नाम इस लिस्ट में नहीं आया. पहले ड्राफ्ट में बहुत सी बातें हैरान करने वाली हैं. दरअसल, इस लिस्ट में ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट( AIUDF) के चीफ और लोकसभा सांसद ‘बदरुद्दीन अजमल’ और उनके दो बेटों के नाम नहीं हैं. जिसे लेकर राज्य में तनाव का माहौल है.

सोशल मीडिया पर तरह-तरह की अफवाहें उड़ रही हैं. हालांकि सरकार ने कहा कि यह पहली लिस्ट है और दूसरी लिस्ट भी जल्द जारी की जाएगी.  वहीं, प्रतिबंधित संगठन उल्फा-आई (ULFA-I)के उग्रवादी ‘परेश बरुआ’ का नाम इस लिस्ट में है. बरुआ का एआरएन नंबर 101831002065041801069 है.

उसे डिब्रूगढ़ जिले के जेरईगांव का रहने वाला बताया गया है. यही नहीं, बरुआ के परिवार वालों के नाम भी इस लिस्ट में है. उग्रवादी परेश बरुआ के अलावा उल्फा-आई (ULFA-I) के एक और बड़े नेता अरुनोदोई दोहुतिया का नाम भी पहले ड्राफ्ट में शामिल है. आपको बता दें कि असम में रहने वाले भारतीय नागरिकों की पहचान के लिए उनका नाम इस रजिस्टर में दर्ज किया जा रहा है. यह कदम असम में अवैध रूप से बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालने के लिए किया गया है.

परेश बरुआ Image Source

भारत के रजिस्ट्रार जनरल शैलेश के मुताबिक, ‘यह ड्राफ्ट का पहला हिस्सा है, जिसमें अब तक 1.9 करोड़ लोगों के नाम पर मुहर लगाई गई है. बाकी बचे नामों की अलग-अलग स्तर पर जांच की जा रही हैं. जैसे ही सत्यापन प्रक्रिया पूरी हो जाएगी, एक और ड्राफ्ट जारी किया जाएगा.’

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि नागरिकों के राष्ट्रीय पंजीकरण (एनआरसी) के प्रकाशन की प्रक्रिया से असम में अशांति पैदा हो सकती है। इसका कारण यह है कि इस प्रक्रिया में लाखों लोग अपनी नागरिकता से हाथ धो सकते हैं। इसके प्रकाशन से राज्य में कानून एवं व्यवस्था की स्थिति गंभीर हो सकती है। अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने प्रदर्शन के दौरान जीवन और संपत्ति को नुकसान पहुंचने की जवाबदेही तय करने से संबंधित मामले में यह दलील दी है।

केंद्र सरकार इस सिलसिले में असम सरकार से लगातार संपर्क में है। सूत्रों के अनुसार हालात से निपटने के लिए सुरक्षाबलों को कभी भी वहां जाने के लिए तैयार रहने को कहा गया है। सोशल मीडिया पर लगातार मॉनिटरिंग करने के निर्देश जारी किए गए हैं और अफवाह फैलाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने को कहा गया है।

खबरों की मानें तो अफवाह भरे कॉन्टेंट को ब्लॉक किया जा रहा है। मीडिया सूत्रों के मुताबिक होम मिनिस्ट्री के सूत्रों के अनुसार विभाग राज्य सरकार से लगातार संपर्क में है। वहां पहले ही लगभग 50 हजार मिलिटरी और ‘पारा मिलिटरी फोर्स’ तैनात कर दी गयी है। पूरे राज्य में लगातार शांति की अपील की जा रही है। केंद्र और राज्य सरकार ने पहले ही आशंका जताई थी कि इस लिस्ट के जारी होने के बाद राज्य में ला ऐंड आर्डर की स्थित खराब हो सकती है।

NRC की पहली लिस्ट जारी हुई जिसके कारण असम में तनाव! इस लिस्ट में उल्फा उग्रवादी का..
लोकसभा सांसद बदरुद्दीन अजमल Image Source

पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों का मामला सबसे बड़ा मुद्दा बन गया है. इस मुद्दे पर कई बड़े और हिंसक आंदोलन भी हुए है। असम के मूल नागरिकों ने तर्क दिया कि अवैध रूप से आकर यहां रह रहे ये लोग उनका हक मार रहे हैं।

साल 80 के दशक में इसे लेकर एक बड़ा छात्र आंदोलन हुआ था, जिसके बाद असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ जिसके तहत 1971 तक जो भी बांग्लोदशी असम में घुसे उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को निर्वासित किया जाएगा. इसके बाद असम गण परिषद ने वहां सरकार भी बनाई. हालांकि यह समझौता आगे नहीं बढ़ सका.

जब साल 2005 में इसी मुद्दे पर एक बार फिर आंदोलन हुआ तब कांग्रेस की असम सरकार ने इस पर काम शुरू किया, लेकिन काम में सुस्ती रहने के बाद यह मामला 2013 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. बीजेपी ने असम में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान इसे बड़ा मुद्दा भी बनाया.

जब असम में पहली बार पूर्ण बहुमत वाली बीजेपी सरकार आई, तो इस मांग ने और जोर पकड़ा. हालांकि असल कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के दबाव में हुई. इस बीच मोदी सरकार के विवादित नागरिकता संशोधान बिल से भी इस मामले में नया मोड़ आ गया, जो अवैध रूप से घुसने वालों के लिए बेस साल 1971 से बढ़ाकर 2014 कर रहा है.

 

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