चीन ने रची नई साजिश! भारत के समझौते को नज़रंदाज़ कर किया नियमों का उलघन

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चीन ने इस बार जान बूझ कर भारत की नदियों में पानी छोड़ने के बारे में सूचना नहीं दी है। इस सवाल का जवाब वैसे तो चीन की सरकार ही बेहतर तरीके से दे सकती है, लेकिन ‘भारत सरकार’ की तरफ से जो सूचनाएं आ रही हैं वे चीन की इस हरकत पर सवाल उठाती हैं।

चीन ने फिर खेली ये टेढ़ी चाल! भारत के समझौते को नज़रंदाज़ कर किया नियमों का उलघन

सूत्रों के अनुसार चीन ने ‘ब्रह्मपुत्र नदी‘ से जुड़ी सूचना साझा करने संबंधी नियमों को नज़रंदाज़ कर इस साल कोई जानकारी भारत को नहीं दी है। दोनो देशों के बीच हुए समझौते के मुताबिक चीन को हर साल 15 मई से 15 अक्टूबर के बीच सतलज व ब्रह्मपुत्र नदियों के पानी की स्थिति के बारे में भारत को लगातार सूचना भेजनी होती है।

भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ‘रवीश कुमार’ ने कहा कि ”मेरा जहाँ तक मानना है, चीन की तरफ से हमे इस बार कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई है। इसके पीछे कोई तकनीकी वजह है या फिर कुछ और वजह है, इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है।

हम आपको बता दे कि भारत और चीन के मध्य वर्ष 2013 में एक समझौता हुआ था जिसके तहत चीन इस बात के लिए तैयार हुआ था कि वह ब्रह्मपुत्र नदी के पानी की स्थिति की लगातार जानकारी भारत को देता रहेगा। उसके पहले चीन की तरफ से ब्रह्मपुत्र नदी पर एक बड़े डैम बनाने की खबर से भारत काफी चिंतित हुआ था। इस समस्या को दूर करने के लिए ही चीन ने यह समझौता किया था।

इस समझौते में यह भी तय हुआ था कि बाढ़ की स्थिति के बारे में शीघ्रता से सूचना का आदान प्रदान किया जाएगा। इसके बाद वर्ष 2015 में दोनो देशों ने इस समझौते में थोडा फेर बदल किया, इस समझौते में सूचनाओं के आदान प्रदान को और भी सरल बनाने की व्यवस्था की गई थी।

चीन की तरफ से तीन तरह की जानकारी भारत को वहां से आने वाली नदियों के जल स्तर, बारिश की स्थिति और कितना पानी छोड़ा गया है, यह सभी जानकारी सही समय पर दी जानी थी। ‘केंद्रीय जल आयोग’ इस जानकारी के आधार पर ही देश में बाढ़ की स्थिति का अनुमान जारी करता है।

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सूत्रों के अनुसार इस बार यह सारी जानकारी भारत को प्राप्त नही हुई है, तो हो सकता है कि इसका असर बाढ़ के बारे में अनुमान लगाने पर पड़ा हो। दोनो देशों के बीच एक ‘विशेषज्ञ स्तरीय समिति’ भी बनाई गई है जिसे साझा नदियों से संबंधित सूचनाओं, इन नदियों पर लगने वाली ऊर्जा परियोजनाओं आदि की जानकारी यह समिति एक दूसरे को देती है।

आपको बता दे कि इस समिति की अंतिम बैठक अप्रैल, 2016 को हुई थी, उसके बाद कोई बैठक नहीं हुई है। भारत और चीन के बीच नदियों को लेकर यह विवाद काफी पुराना है। खास तौर पर हर बार ब्रह्मपुत्र नदी को लेकर दोनो देश एक दूसरे पर आरोप प्रात्यारोप लगाते रहते हैं। चीन की तरफ से पहले कई बार ब्रह्मपुत्र नदी को लेकर भारत को चेतवानी भी दी गई है।

एक बार एक चीनी विशेषज्ञ ने वहाँ जल की समस्या को समाप्त करने के लिए ‘तिब्बत‘ से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की धारा को ही बदलने की योजना पेश की थी। वर्ष 2000 में असम मे आई भीषण बाढ़ के लिए ब्रह्मपुत्र नदी में चीन की तरफ से बहुत ज्यादा पानी छोड़े जाने को ही असली वजह माना जाता है।

यह समझौता भारत और चीन के मध्य वर्ष 2015 में हुआ था, तब यह मन गया कि आगे चल कर यह ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े एक बड़े समझौते का आधार बनेगा जिसमें बांग्लादेश को भी शामिल किया जा सकता है। लेकिन अब यह बात साफ हो गई है की चीन की इच्छा भारत आने वाली नदियों को लेकर सही नहीं है।

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