दहेज उत्पीड़न मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया अहम फैसला! जिससे लोगों की बढ़ी मुश्किलें

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Supreme Court verdict over dowry harassment cases (नई दिल्ली) : शुक्रवार 14 सितंबर को ‘दहेज प्रताड़ना’ के मामलों को लेकर ‘उच्चतम न्यायालय’ ने बड़ा फैसला सुनाया है. जिसके बाद ऐसे मामलों में शामिल लोगों की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं. सूत्रों की माने तो यदि अब कोई महिला अपने पति और उसके परिवार के खिलाफ आईपीसी की धारा 498ए के तहत दहेज उत्पीड़न का मुकदमा दर्ज कराती है तो उन लोगों की तुरंत गिरफ्तारी हो सकती है.

Supreme Court verdict over dowry harassment cases
सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ‘दहेज प्रताड़ना’ के मामले को लेकर अपना फैसला सुनाते हुए कहा है कि इस तरह के मामलो के हल के लिए ‘परिवार कल्याण समिति’ की आवश्यकता नहीं है. साथ ही उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि कुछ लोगों कानून का दुरुपयोग कर रहे हैं और पीड़ित की सुरक्षा को देखते हुए ऐसा फैसला लेना आवश्यक है. दरअसल न्यायालय ने कहा है कि आरोपियों के लिए अग्रिम जमानत का विकल्प खुला है.

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दहेज प्रताड़ना

सूत्रों की माने तो इस तरह के मामलो में में सीधी गिरफ्तारी पर रोक के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर न्यायालय ने इसी साल अप्रैल में फैसले को सुरक्षित रख लिया था. जुले 2017 में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने दहेज प्रताड़ना अधिनियम के हो रहे दुरूपयोग के मद्देनजर कुछ दिशानिर्देश दिए थे, जिसके बाद मुख्य न्यायाधीश ‘दीपक मिश्रा’ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने दहेज उत्पीड़न कानून के दुरूपयोग को रोकने के मद्देनजर दो सदस्यीय पीठ द्वारा दिशानिर्देश बनाने केनिर्णय पर पुन: परीक्षण करने का फैसला लिया था.

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दीपक मिश्रा

इस मामले को लेकर पीठ ने कहा था कि जब 498ए को लेकर आईपीसी में पहले से ही प्रावधान हैं, इस स्थिति में न्यायालय दिशानिर्देश कैसे बना सकता है? हां, ऐसा अवश्य हो सकता है कि जांच एजेंसी को अपने अधिकारों का उपयोग करते समय सतर्क रहना चाहिए परंतु गाइडलाइंस क्यों बनाना चाहिए?

ध्यान देने वाली बात यह है कि 28 जुलाई 2017 को ‘राजेश शर्मा’ बनाम उत्तर प्रदेश मामले में दो सदस्यीय पीठ ने कई दिशानिर्देश दिए थे. जिसमें पीठ ने दहेज उत्पीड़न मामले में बिना जांच-पड़ताल के पति और ससुराल वालों की गिरफ्तारी पर रोक की बात कही गई थी। साथ ही पीठ ने हर जिले में कम से एक परिवार कल्याण समिति के गठन का निर्देश दिया था.
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इस मामले को लेकर शीर्ष अदालत ने कहा था कि 498ए की हर शिकायत को समिति के पास भेजा जाए और समिति की रिपोर्ट आने तक आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होनी चाहिए. साथ ही इस काम के लिए सिविल सोसाइटी को भी शामिल करने का निर्देश दिया गया था।.

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