शैलेंद्र जैसे दिल को छूने वाले मधुर गीत रचयिता दुबारा नहीं मिलेंगे

523

नई दिल्ली, 30 अगस्त, 2016 – आज बॉलिवुड के अति लोकप्रिय गीतकार-जनकवि शैलेंद्र का 93वां जन्मदिवस है। शंकरदास केसरीलाल के रूप में उनका जन्म 30 अगस्त, 1923 को रावलपिंडी में हुआ था। मथुरा में पले-बढ़े थे और 1942 में रेलवे में भर्ती हुए। लेकिन उनका दिल कविताओं में था। कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होकर शैलेंद्र ने शोषण, अन्याय व उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई। उनकी कविताऐं इप्टा के रंगमंच पर बुलंद हुई। एक कवि सम्मेलन में कविराज शैलेंद्र ‘जलता है पंजाब‘ पर कविता कह रहे थे। राजकपूर उनसे प्रभावित हुए, शैलेंद्र की सरलता उन्हें भा गयी। उन्होंने अपनी फिल्म ‘आग‘ के लिये शैलेंद्र से गीत लिखने को कहा, जिसे शैलेंद्र ने विनम्रता से ठुकरा दिया।

शैलेन्द्र : गीतकार
शैलेन्द्र : गीतकार

उधार के 500 रूपये के कारण फिल्मी गीतकार बने
सन् 1948 में राजकपूर का ऑफर ठुकराने के बाद शैलेंद्र शादी के बंधन में बंधे। अब गृहस्थी का बोझ उठाना मुश्किल हुआ। तो शैलेंद्र राजकपूर के पास पहुंचे और अपनी परेशानी कहकर उनसे 500 रूपये उधार लिये। कुछ अंतराल पर शैलेंद्र अपना उधार चुकाने राज के पास गये। राजकपूर ने वो पैसे पहीं लिये, बल्कि कहा कि बदले में दो गीत लिखकर दे दो। तब शैलेंद्र ने फिल्म बरसात (1949) के दो गीत लिखे। ऐसी परिस्थितियों में शैलेंद्र फिल्मी गीतकार बन गये। संयोग से बरसात से एक नई टीम उभरी – राजकपूर, शैलेंद्र, हसरत जमपुरी व संगीतकार शंकर जयकिशन। शैलेंद्र ने 500 रूपये प्रतिमाह की पगार पर राज की टीम का सशक्त हिस्सा बन गये। राज उन्हें कविराज/पुष्कन नाम से बुलाते थे।
राजकपूर की लगभग सभी फिल्मों में शैलेंद्र ने प्रमुख गीत लिखे। आवारा (1951) की थीम पर ‘आवारा हूं…..‘ गीत रचा। ‘दम भर जो इधर….‘, ‘घर आया मेरा पददेसी…..‘ व ‘एक बेवफा से प्यार किया…..‘ जैसे गीतों से शैलेंद्र ने कमाल कर दिखाया। श्री 420 (1955) में राजकपूर की जोकर की छवि उभारी ‘मेरा जूता है जापानी……‘, रमैया वस्ता वैइया….., मुड़-मुड़ के न देख…., प्यार हुआ इकरार हुआ….. जैसे गीतों ने शैलेंद्र को शीर्ष पर पहुंचा दिया। शैलेंद्र की विशेषता रही कि उन्होंने धुनों पर कठिन कार्य वाले गीतों से अपना कमाल दिखाया। फिल्म आजादी (1959) में राजकपूर ने कृति नहीं की, पर हिरो थे। इसके गीत ‘किसी की मुस्कराहट पर….., ‘सब कुछ सीखा….‘ ‘दिल की नजर से…..‘ ‘तेरा जाना दिल के अरमानों….‘ जैसे सुरमयी गीतों की रचना की। संगम (1964) में हर दिल जो प्यार करेगा से रिझाया। दिल अपना और प्रीत पराई के गीत ‘अजीब दास्तां है ये…‘ से सबको प्रभावित किया।
शंकर जयकिशन की दर्जनों फिल्मों में शैलेंद्र ने लाजवाब गीत लिखे और श्रोताओं के दिल में बस गये। जिस देश में गंगा बहती है (1960) में ‘होठों पे सच्चाई रहती है……, आ अब लौट चलें….. ओ बसंती पवन पागल….. में देशभक्ति व विरह का रूप दर्शाया। इसी फिल्म के गीत ‘मेरा नाम राजू..‘ में अपना जीवन परिचय इस प्रकार दिया – काम नये नित गीत बनाना, गीत बनाकर जहां को सुलाना, कोई ने मिले अकेले में गाना। सीमा (1955/तू प्यार कर सागर है), असली-नकली (1964/तेरा मेरा प्यार अमर), दिल एक मंदिर (1963/रूक जा रात ठहर जा, याद न जाये बीते दिनों की), रंगोली (छोटी सी ये दुनिया), बेटी-बेटे (आकल में ढल गया), प्रोफेसर (नजर बचाकर चले गये थे), चोरी-चोरी (ये रात भीगी-भीगी) व नई दिल्ली (नखरे वाली) उनकी शंकर-जयकिशन के साथ की प्रमुख फिल्में हैं। सलिल चौधरी व एस डी बर्मन के साथ भी हिट रचनायें कीं। अन्य के साथ भी जमें।
दो बीघा जमीन (1953) व मधुमति (1958-सुहाना सफर, आ जा रे परदेसी, ओ पापी बिछुआ) सलील चौधरी के साथ की। सचिन दा के साथ उन्होंने फिल्म काला बाजार (1960/खोया-खोया चांद, अपनी तो हर आह), बंदिनी (मेरे साजन है) व मेरी सूरत तेरी आंखें (1963/पूछो न कैसे मैंने) तथा गाईड (गाता रहे मेरा दिल, पिया तोसे नैना, क्या से क्या हो गया) फिल्मों में कमाल दिखाया। केवल रोमांटिक व भावुक गीत ही नहीं लिखे बल्कि बच्चों के लिये ‘नन्हें मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में…(बूट पॉलिश), ‘चुन-चुन करती आयी चिडि़या…(अब दिल्ली दूर नहीं) व ‘मुन्ना बड़ा प्यारा…(मुसाफिर) जैसे गीत रचे। चाहे कोई मुझे जंगली कहे (जंगली), लाल छड़ी मैदान खड़ी (जानवर) में कॉमेडी थी। विविधिता के लिये सम्राट तानसेन (झूमती चलती हवा) व अनुराधा (हाय रे वो दिन क्यों न आये) के गीतों से चौंकाया। फिल्म मेरा नाम जोकर का गीत ‘जीना यहां मरना यहां…‘ अधूरा था कि उनकी मृत्यु हो गयी। तब राज ने उनके पुत्र शैली शैलेंद्र (17 वर्ष) से पूरा कराया था। शैलेंद्र की प्रमुख 258 गीत रचनाओं में सर्वाधिक 90 गीत लता मंगेशकर ने गाये थे। मुकेश व रफी का उनके बाद स्थान था। अन्य गायकों के हिस्से 67 गीत आये।

बहुयामी प्रतिभा के धनी थे शैलेंद्र
शैलेंद्र द्वारा रचित गीतों को फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। यह गीत थे – ये मेरा दीवानापन है या मोहब्बत (1958 यहूदी/दिलीप कुमार पर चित्रित), सब कुछ सीखा हमने न सीखी (अनाड़ी/1959) तथा मैं गाउं तुम सो जाओ (ब्रह्मचारी/1958)। शैलेंद्र ने गीत लिखने के अलावा फिल्म की अन्य विधाओं में भी शिरकत की थी। फिल्म बूट पॉलिश (1953), श्री 420 (1955) व तीसरी कसम (1966) में उन्होंने अभिनय किया था। फिल्म परख (1960) के संवाद लिखे थे। फणेश्वर नाथ रेणू की कहानी ‘मारे गये गुलफाम‘ पर अपनी फिल्म तीसरी कसम (1960) का निर्माण किया था। रेणू ने कहानी के लिए 5000 रूपये मांगे थे, पर सम्मान स्वरूप उन्होंने 10000 रूपये का भुगतान किया। शैलेंद्र को इस फिल्म के लिये काफी कर्जा लेना पड़ा था। वितरक फिल्म का अंत बदलना चाहते थे, लेकिन शैलेंद्र टस्स से मस्स न हुए। फिल्म रिलीज हुई, पहले नहीं चली लेकिन राष्ट्रीय पुरस्कार पाने व मीडिया की तारीफ से चली थी। फिल्म की शुरूआती असफलता व आर्थिक कमजोरी को शैलेंद्र झेल न पाये। 14 दिसंबर, 1966 को 43 वर्ष की उम्र में शैलेंद्र चल बसे थे। संयोगवश 14 दिसंबर को राजकपूर का जन्मदिवस भी होता है।

loading...