यूएन घोषणापत्र एचआईवी/एड्स दवाओं पर भारतीय नीति के पक्ष में

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संयुक्त राष्ट्र, 9 जून – दुनिया भर के गरीबों के लिए एचआईवी और एड्स जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज के लिए जेनरिक दवाएं बनाने की इजाजत देने की भारत की नीति को संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की स्वीकृति मिल गई है।

भारत ने बौद्धिक संपदा कानूनों में लचीलेपन का इस्तेमाल करते हुए ऐसा किया है। भारत ने आम सभा को आश्वस्त किया है कि वह विकासशील देशों को दवाओं की जीवन रक्षक दवाएं मुहैया कराना जारी रखेगा।

यूएन घोषणापत्र एचआईवी/एड्स दवाओं पर भारतीय नीति के पक्ष में
यूएन घोषणापत्र एचआईवी/एड्स दवाओं पर भारतीय नीति के पक्ष में

संयुक्त राष्ट्र की आम सभा की एचआईवी एवं एड्स पर एक उच्चस्तरीय बैठक में बुधवार को राजनीतिक घोषणापत्र को स्वीकार किया गया कि सुरक्षित, प्रभावी और सस्ती दवाओं तक पहुंच एक बुनियादी अधिकार है। सभी देशों से आग्रह किया गया कि वे यह सुनिश्चित करें कि व्यापार करार में बौद्धिक संपदा अधिकार के प्रावधान जेनरिक दवाएं मुहैया कराने के वर्तमान रास्ते को नष्ट नहीं करें।

एचआईवी यानी ह्यूमन इम्युनोडिफिसिएन्सी वायरस ही एड्स का कारण बनता है।

देशों से आग्रह किया गया है कि व्यापार से जुड़े बौद्धिक संपदा अधिकार (ट्रिप) के करार में लचीलेपन का इस्तेमाल करें। खासकर सामान तक लोगों की पहुंच को बढ़ावा देने और दवाओं के व्यापार के मामले में ऐसा करें।

भारत के स्वास्थ्य मंत्री जे. पी. नड्डा ने बैठक में कहा कि भारतीय औषधि उद्योग ने एचआईवी/एड्स के इलाज के लिए काम आने वाले 80 फीसदी से अधिक दवाओं की आपूर्ति कर लाखों लोगों का जीवन बचाने में मदद की है।

उन्होंने कहा, सस्ती दवाओं की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए भारत ट्रिप के लचीलेपन को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।

ट्रिप विश्व व्यापार संगठन के तहत एक अंतर्राष्ट्रीय करार है जो पेटेंट दवाए हैं उनका जेनरिक संस्करण बनाने पर रोक लगाता है। हालांकि, ट्रिप के अंतर कथित लचीलापन देशों को कुछ खास परिस्थितियों में अनिवार्य लाइसेंस जारी कर दवाओं की सस्ती जेनरिक दवाएं बनाने की इजाजत देते हैं।

इस घोषणा में कहा गया कि बौद्धिक संपदा अधिकार को लागू करने के उपायों को इस रूप में समझा जाना चाहिए कि वे सदस्य राष्ट्रों के जन स्वास्थ्य के अधिकारों का मददगार है और खासकर सबको दवा की उपलब्धता सुनिश्चित कराने को बढ़ावा देता है।

यह घोषणा एड्स के मुकाबले में दक्षिण-दक्षिण सहयोग एवं इस बीमारी को वर्ष 2030 तक पूरी तरह से खत्म कर देने का लक्ष्य निर्धारित करने का समर्थन करती है।

दवा बनाने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत पर जेनरिक दवाएं बनाने के लिए अनिवार्य लाइसेंस जारी करने के खिलाफ दबाव बना रही हैं। डॉक्टर्स विदाउट बार्डर या मेडिसिन्स सैन्स फ्रांटियर्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मानवातावादी संगठन इसके जवाब में भारत के दवाओं के सस्ते संस्करण बनाने की इजाजत देने के पक्ष में अभियान चला रहे हैं।

नड्डा ने कहा कि भारत एड्स की महामारी का 15 साल पहले सामना कर चुका है। वर्ष 2007 से एड्स की वजह से होने वाली मौतों में करीब 55 फीसदी की कमी आई है। वर्ष 2000 से एचआईवी संक्रमण करीब 66 फीसदी घटा है। करीब दस लाख लोगों का अभी इलाज चल रहा है।

लोगों को सस्ती दवाएं उपलब्ध कराए बगैर यह उल्लेखनीय सफलता हासिल कर पाना संभव नहीं था।

भारत के राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के आकलन के अनुसार, वर्ष 2015 में 21 लाख लोग एड्स से पीड़ित थे और उस साल 86 हजार नए संक्रमण हुए थे।

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