1930 में गायब हुए चीन के सबसे बड़े मंदिर की हुई खोज! गायब होने की ये थी वजह

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बीजिंग : अभी-अभी जानकारी मिली है कि पिछले चार साल से चली आ रही खुदाई के बाद एक सबसे बड़े मंदिर के खंडहर को खोज निकाला है. यह मंदिर साल 1930 में आग के कारण तबाह हो गया था. खोजने के बाद इस मंदिर को लेकर बहुत से रहस्य सामने आ रहे हैं. 

सूत्रों के अनुसार आपको बता दें कि चार साल की खुदाई के बाद सबसे बड़े ‘ताओवादी मंदिर’ का खंडहर खोजा है. जानकारी के अनुसार आपको बता दें कि मंदिर का निर्माण सांग वंश (साल 960 से 1279) में किया गया था और आपको यह भी बता दें कि यह मंदिर साल 1930 में ध्वस्त हो गया था. ध्वस्त होने से पहले इस मंदिर में हर रोज़ पूजा की जाती थी. चीन के इस सबसे बड़े मंदिर की जगह को लेकर पुरातत्वविदों ने भी पुष्टि कर दी है. 

 

चीन के नेशनल म्यूजियम के पुरातत्वविद ‘शिन लिक्सियांग’ द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार ग्रेट शांगकिंग पैलेस चीनी इतिहास के ताओ धर्म के ङोंगई संप्रदाय और बहुत से सम्राटों के लिए यह मंदिर मुख्य स्थल था. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पता चला है कि इस मंदिर को चीन के पुरातत्वविदों ने पूर्वी जिआंग्शी प्रांत के ‘लोंघु माउंटेन’ की तलहटी में पांच हजार वर्ग मीटर में निर्मित स्थल की खोज कर डाली है. साथ ही आपको यह भी बता देते हैं कि यह मंदिर चीनी ताओवादी मास्टर को समर्पित किया गया था.

 

जानकारी के अनुसार आपको बता दें कि इस मंदिर की स्थापना ‘झांग डाओलिंग’ द्वारा हुई थी. इनको मास्टर झांग के नाम से जाना जाता था. लोग ऐसा मानते हैं कि वह लोंघु माउंटेन में निवास किया और यहीं से ताओवादी की शुरुआत की थी. साथ ही आपको यह भी बता दें कि मास्टर झांग ने इस मंदिर का निर्माण मूल रूप से पहाड़ी के शिखर पर हान वंश (ईसा पूर्व 202 से 220 ई.) पर किया था. उसके बाद सांग वंश के दौरान पहाड़ी के नीचे झांग को समर्थित ताओवादी स्थल का निर्माण कराया.

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