लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद महागठबंधन में मच रहा है घमासान! ये है बड़ी वजह…

334

After getting defeated in the Lok Sabha elections there is a lot of turmoil in the alliance! This is the big reason (पटना) : “लोकसभा चुनाव” में मिली करारी शिकस्त के बाद ‘महागठबंधन’ में आपसी फूट जारी है. वहीं बिहार सियासत में सांकेतिक गतिविधियां सिर्फ राजग में ही नहीं, बल्कि दूसरी तरफ भी चल रही हैं. जिसको देखकर लगता है कि महागठबंधन में मतलब की दोस्ती के टुकड़े होने वाले हैं. जिनके बीच याराना था, वे अब कन्नी काटने लगे हैं और दुश्मन की भाषा बोलने लगे हैं.

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद महागठबंधन में मच रहा है घमासान! ये है बड़ी वजह...

सूत्रों की माने तो लोकसभा चुनाव से पहले राजग के खिलाफ बिहार में पांच दल एकजुट हुए थे.महागठबंधन में राजद-कांग्रेस गठबंधन से जदयू के अलग होने के बाद ‘हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम), राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) और नवगठित वीआईपी’ शामिल हुई थी. इस सभी पार्टियों ने मिलकर संयुक्त मोर्चा तैयार किया. चुनाव लड़े और हार गए. अब उत्तर प्रदेश की तरह फिर नई राह पर हैं. 

यह भी पढ़े : महागठबंधन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिए गए इस बयान से कांग्रेस की उड़ी धज्जियां…

चुनाव में करारी हार झेलने के बाद नेता प्रतिपक्ष ‘तेजस्वी यादव’ बिहार से गायब हैं. वहीं दोनों सीटों पर खुद हारकर रालोसपा प्रमुख ‘उपेंद्र कुशवाहा’ दोहरे सदमे में हैं और समीक्षा करा रहे हैं.

सूत्रों की माने तो लालू प्रसाद यादव का वोट बैंक ट्रांसफर हुआ या नहीं. यादवों ने अगर वोट नहीं किया तो गठजोड़ का मतलब क्या रह जाएगा. उपेंद्र कुशवाहा की गतिविधियां से साफ दिख रहा है कि धीरे-धीरे एकला चलो की राह पर बढ़ रहे हैं.

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद महागठबंधन में मच रहा है घमासान! ये है बड़ी वजह...
तेजस्वी यादव और उपेंद्र कुशवाहा

ध्यान सेने वाली बाद ‘मुकेश सहनी’ चुनाव हरने के बाद सियासत की दुनिया छोड़ मुंबई लौट गए हैं और व्यवसाय में व्यस्त हो गए हैं. दूसरी तरफ बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री ‘जीतनराम मांझी’ को महागठबंधन का माहौल भा नहीं लग रगा है. वह नए कुनबे से प्रेरित-प्रोत्साहित हो रहे हैं. इफ्तार की दावत के बहाने आना-जाना शुरू कर दिया. गले मिल चुके हैं. दिल का मिलन अभी बाकी है.

वहीं कांग्रेस और राजद के संबंधो में पहले जैसा प्यार नहीं दिखाई दे रहा है. कांग्रेस के कुछ लोग अकेले चलने के पक्ष में हैं तो कुछ को आलाकमान का अनुसरण करना है. दिल्ली से आदेश मिलना बाकी है. फिलहाल अभी चुनाव में हुए नफा-नुकसान का आकलन किया जा रहा है. 

कल साथ खड़े थे और आज विरोध में

सूत्रों की माने तो लोकसभा चुनाव के पहले जातीय गठजोड़ करके एक-दूसरे के सहारे संसद पहुंचने के सपने देखने वाली कई पार्टी सक्रिय हो गई थी. सभी की राजद का माय (मुस्लिम-यादव) समीकरण नजर आ रहा था. राजद के नए उत्तराधिकारी को भी जातियों की व्यापक गोलबंदी दिखाई दे रही थी.

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद महागठबंधन में मच रहा है घमासान! ये है बड़ी वजह...
जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी

ध्यान देने वाली बात यह है कि उपेंद्र कुशवाहा, जीतनराम मांझी और मुकेश सहनी एक-एक करके राजग की गोद से उछलकर राजद-कांग्रेस गठबंधन में शामिल हो गए थे. चुनाव के बाद जैसे ही पाला बदला तो मौकापरस्ती की परिभाषा भी बदल दी. चार साल तक जिनके पास शिक्षा महकमा था, उन्हें शिक्षा व्यवस्था में अचानक खोट नजर आने लगी है. वहीं सपा नेता ‘शरद यादव’ ने भी जब जैसा-तब तैसा की बड़ी नजीर पेश की. राजद की राजनीति का विरोध करके मधेपुरा से लालू को हराने वाले शरद इस बार अपने मतलब के लिए गोद में बैठ गए.

ठीक इसी प्रकार मंडल की राजनीति से पहले ‘लालू प्रसाद यादव’ ने कांग्रेस के विरोध के लिए भाजपा से भी परहेज नहीं किया था. ध्यान देने वाली बात यह है कि लालू प्रसाद खुद को जेपी की संपूर्ण क्रांति की उपज बताते हैं. जेपी की यह क्रांति कांग्रेस के खिलाफ हुई थी, परंतु लालू आज कांग्रेस के बड़े साझीदार हैं.

चुनाव प्रक्रिया के समय भी लिया यू-टर्न 

आपको बता दें कि बिहार में महागठबंधन का नेतृत्व करने वाले तेजस्वी यादव ने शुरुआत में तो बाहुबली विधायक ‘अनंत सिंह’ को बैड एलीमेंट करार दिया था. जब कांग्रेस इस बात पर अड़ गई और राजद को अनंत की जरूरत महसूस हुई तो तेजस्वी ने उनको भी गले से भी लगा लिया. उन्होंने अपने प्रमुख नेता ‘रघुवंश प्रसाद सिंह’ के समर्थन में वैशाली में अनंत सिंह का रोड शो कराया.

लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिलने के बाद महागठबंधन में मच रहा है घमासान! ये है बड़ी वजह...
शरद यादव और लालू प्रसाद यादव

दूसरी तरफ तेजस्वी को पाटलिपुत्र सीट पर अपनी बहन ‘डॉ. मीसा भारती’ की जीत सुनिश्चित कराने के लिए भी अनंत की जरुरत महसूस हुई. साथ हो तेजस्वी यादव ने खुद भी अनंत सिंह के लिए मुंगेर में चार-चार सभाएं की थी. कुछ दिनों के दौरान ही विचारों की पलटी का यह बड़ा उदाहरण है.

loading...