भगत सिंह ने दिलेरी से जलाया था देशभक्ति का चिराग : जन्मदिन पर विशेष

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नई दिल्ली, 28 सितम्बर, 2016 – अमर शहीद भगत सिंह ने जिस साहस व हिम्मत से शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार को चुनौती दी व मात्र 23 वर्ष की उम्र में अपने प्राण देश को न्यौछावर कर दिये, वो एक बड़ा आदर्श है। उनका जन्म 28 सितंबर, 1907 को बंगा (जिला लायलपुर/अब पाकिस्तान) में एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था। कुछ लोग उनकी जन्मतिथि 27/09/1907 को मनाते हैं। उनके पिता किशन सिंह तथा दो चाचा अजीत सिंह व स्वर्ण सिंह अंग्रेजों का विरोध करने के कारण जेल में बंद थे। भगत सिंह के जन्मदिवस पर उनको रिहा किया गया था। भगत सिंह की दादी ने उनका नाम ‘मांगा वालो‘ (भाग्यवान) रखा गया था। मां विद्यावति के लाडले थे। बचपन में ही उनके खेल युद्ध अभ्यास/आक्रमण करने वाले होते थे। बाल मन में ही अंग्रेजों की दासता से देश को आजाद कराने का विचार उनके मष्तिष्क में बस गया था। 12वीं पास की तो उनके विवाह की चर्चा सुनकर घर छोड़कर कानपुर चले आये।

कानपुर में भगत सिंह की मुलाकात गणेश शंकर नामक विद्यार्थी से हुई। वहां भगत ने अखबार प्रताप व दिल्ली दरबार के छद्म नामा (बलबीर सिंह/क्रांतिकारी) लिखना शुरू किया। इससे पूर्व 1919 में ‘रॉलेट एक्ट‘ के विरोध में प्रदर्शन हुए और 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग का गोलीकांड हुआ था। तब वह लाहौर से पैदल चलकर अमृतसर पहुंचे थे। वहां से रक्त से भीगे मिट्टी के टुकड़े एक शीशी में एकत्र किये ताकि उसे दखकर देशवासियों के साथ हुआ अत्याचार का बदला लेना याद रहे। असहयोग आंदोलन (1920) में सक्रिय हुए तथा लाला लाजपत राय द्वारा असहयोग आंदोलन से प्रभावित युवाओं के लिये लाहौर में स्थापित ‘नेशनल कॉलेज‘ में प्रवेश लिया। इसी कॉलेज में उनकी भेंट यशपाल, भगवतीचरण, सुखदेच, तीरथराम व झंडा सिंह आदि से हुई। अपने इन्हीं साथियों से क्रांति की प्रेरणा ली। साथ ही कॉलेज के नाटक क्लब में देशभक्तिपूर्ण नाटकों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। यह नाटक मुख्यतः थे – राणा प्रताप, चंद्रगुप्त आदि।

क्रांतिकारी गतिविधियां……
जब 12 वर्ष के थे तो जलियांवाला बाग हत्याकांड से बहुत प्रभावित हुए थे। असहयोग आंदोलन का हिस्सा बने पर यह तरीका उन्हें प्रभावी प्रतीत नहीं हुआ। क्रांति गदर पर अगुआ सरदार करतार सिंह को भगत सिंह ने अपना आदर्श माना। देश में युवा क्रांति हेतु ‘नौजवान भारत सभा‘ का गठन 1928 में किया। काकोरी कांड में 4 क्रांतिकारियों को फांसी चढ़ाने व 16 को जेल में डालने से भगत सिंह उद्विग्न हुए कि अपने दल का विलय चंद्रशेखर आजाद की पार्टी (हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन) में कर दिया और उसे एक नया नाम दिया ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन‘।

लाला जी की मृत्यु का प्रतिशोध……
सन् 1928 में साईमन कमिशन के बहिष्कार के लिये देश भर में जबरदस्त प्रदर्शन हुए। लाहोर में प्रदर्शनकारियों पर अंग्रेजी पुलिस ने बर्बरतापूर्वक लाठी चार्ज किया। इसी लाठी चार्ज से आहत हुए लाला लाजपत राय की मौत हो गयी। भगत सिंह व उनके साथी इस घटना से अत्यधिक क्रोध में आ गये। उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर पुलिस सुपरिंटेडेट स्कॉट को मारने की योजना बनाई। सोची योजना के अनुसार भगत व राजगुरू लाहोर की कोतवाली के सामने व्यस्त मुद्रा में टहलने लगे। जय गोपाल सड़क के के किनारे अपनी साईकिल लेकर यूं बैठ गये जैसे वो खराब हो गयी हो। उधर चंद्रशेखर आजाद पास के स्कूल की चार दीवारी के पास छिपकर घटना को अंजाम देने में सुरक्षा का कार्य कर रहे थे।
17 दिसंबर, 1928 की शाम 4 बजे ए.एस.पी. सांडर्स के आते ही जयगोपाल के इशारे पर राजगुरू व भगत सचेत हो गये। सांडर्स के दिखते ही राजगुरू ने एक गोली उसके सिर पर मारी, गिरते ही वह होश गवां बैठा। इसके तुरंत बाद भगत ने 3-4 गोलियां उसके शरीर में दागकर उसका काम तमाम कर दिया। जब भगत-राजगुरू भागने लगे तो एक सिपाही उनका पीछा करने लगा। चंद्रशेखर ने उसे सावधान किया ‘अगर आगे बढ़े तो गोली मार दूंगा।‘ सिपाही अनसुनी कर पीछा करता रहा, तब आजाद ने उसे गोली से उड़ा दिया। इस तरह भगत सिंह व उनके साथियों ने लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला ले लिया। पुलिस चाहकर भी तीनों को पकड़ने में नाकाम रही।
देश की जनता में प्रतिशोध उभारने व अंग्रेज सरकार को चेताने के लिये भगतसिंह ने एक साहसिक निर्णय लिया। अपने क्रांतिकारी साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर 8 अप्रैल, 1929 को नई दिल्ली स्थित ब्रिटिश भारत की तत्कालीन असेंबली (विधि सदन) के सभागार में दो बम फेंके और परचे बांटे। ऐसा करने के बाद आसानी से पुलिस को अपनी गिरफ्तारी दे दी। लगभग दो साल तक जेल में रहे। जेल में यूरोपिय के समान व्यवहार करने के लिये 166 दिन भूख हड़ताल की थी, जिसमें एक क्रांतिकारी की मौत भी हुई थी।
भगत सिंह एक अच्छे वक्ता, पाठक व लेखक थे। कई पत्र-पत्रिकाओं में लिखा व संपादन किया। जेल में भी भगत ने लेखन कार्य किया था। उनकी प्रमुख रचनाऐं थीं – एक शहीद की जेल नोट बुक (संपादन भूपेंद्र हूजा), सरदार भगत सिंह पत्र और दस्तावेज (संकलन/विरेंद्र संधु) तथा भगत सिंह के संपूर्ण दस्तावेज (संपादन-चमन लाल)। जब जेल में थे तो उन्हें कई लालच दिये गये कि वह माफी मांग लें तो उनकी फांसी की जगह सिर्फ कैद होगी। लेकिन स्वाभिमानी देशभक्त भगत को यह गंवारा नहीं था, बल्कि उन्होंने मांग की कि उन्हें देशद्रोही की तरह गोली से उड़ा दिया जाय। वह जेल में अकसर ‘इंकलाब जिंदाबाद‘ व ‘भारत माता की जय‘ के नारे लगाते थे।

फांसी…….
अंग्रेजों ने समय बदलकर अंततः 23 मार्च, 1931 की शाम को भगत सिंह, राजगुरू व सुखदेव को फांसी पर लटका दिया था। फांसी से पूर्व भगत से अंतिम इच्छा के लिये पूछा तो उन्होंने कहा कि वो लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और वह उन्हें पूरी करने का समय दिया जाय। समय खत्म होने पर भगत ने कहा ‘ठहरो एक क्रांतिकारी को दूसरे क्रांतिकारी से मिलने तो दो‘ और यह कहकर किताब छत पर फेंक दी। फिर कहा कि ‘ठीक है, अब चलो।‘ उधर राजगुरू व सुखदेव को फांसीगृह की ओर ले जाया जा रहा था। तीनों आपस में मुस्कुराये और गाने लगे ‘मेरा रंग दे बसंती चोला। माय रंग दे बसंती चोला…….‘।
फांसी देने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों को विद्रोह की आशंका हुई। वे तीनों शवों के टुकड़े कर बोरी में भरकर फिरोजपुर ले आये और जहां घी के बदले मिट्टी का तेल डालकर ही इनको जलाया जाने लगा। तभी स्थानीय गांव वासी वहां पहुंचने लगे तो डर के मारे अंग्रेजों ने बोरियां सतलुज नदी में फेंक दीं। गांववासियों को इन तीनों को दी फांसी का पता चल गया था। नदी से उनके शरीर के टुकड़ों को एकत्र कर विधिवत दाह-संस्कार किया। यही है गाथा वीर भगत सिंह की, जिन्होंने मात्र 23 वर्ष की उम्र में ऐसे साहसपूर्ण कार्यों से अंग्रेजों से लोहा लिया।

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