इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : ‘बहुरुपिया कला’ को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप

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नई दिल्ली : कलाकारों को अलग-अलग रूप धरते तो आपने देखा होगा या फिर कह सकते हैं ‘व्यक्ति एक और रूप अनेक’, इसी को ‘बहुरूपिया’ कला का नाम दिया गया है। राजस्थान समेत देश के अनेक राज्यों में यह कला बेहद लोकप्रिय है। इसमें कलाकार अलग-अलग भेष धर कर लोगों का खूब मनोरंजन करते हैं। 

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप

दूसरे शब्दों में कहें तो बहुरुपिया एक ऎसा हुनरमंद कलाकार होता है, जिसके लिए रंगमंच की अनिवार्यता नहीं होती, एक ही कलाकार लेखक, कवि, संवाद रचयिता, अभिनेता, गायक, वादक, नर्तक, रूप और वेश सज्जाकार होता है जो गांव-गांव, नगर नगर घूम कर लोगों का मौलिक मनोरंजन करता है और जीवन यापन के लिए बक्शीश और आश्वासन पाता है।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप
रंगकर्मी विलास जानवे जी बहुरूपिये कलाकारों के साथ

उदयपुर के जाने माने रंगकर्मी विलास जानवे के निर्देशन में नई दिल्ली के इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में 5 से 7 अक्टूबर तक तीन दिवसीय ‘राष्ट्रीय बहुरुपिया उत्सव’ का आयोजन हुआ। इस आयोजन का एकमात्र उद्देश्य नई पीढ़ी भारत की इस पुरानी विरासत से रूबरू करवाना था। इस विशाल उत्सव में राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, तेलंगाना, कर्नाटक, तामिलनाडू, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के 70 बहुरूपी कलाकारों ने अपनी विलक्षण प्रतिभा का प्रदर्शन किया।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप

तीन दिन तक चले इस महोत्सव में बहुरूपियों ने मंच से एकल ,युगल और सामूहिक किरदारों की विविधता का विविधता का जानदार प्रदर्शन कर लोगों का मौलिक मनोरंजन किया।

विलास जानवे ने बताया कि किसी जमाने में जनता के दिलों के करीब रही और प्राचीन काल से चली आ रही बहुरूपी कला आज धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। भारत की इस संघर्षरत कला को सम्बल देने और लोगों में इस कला के प्रति सम्मान जगा कर बहुरूपी कला को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से नई दिल्ली में तीन दिवसीय ‘राष्ट्रीय बहुरुपिया उत्सव’ का आयोजन किया गया। जिससे लोग इन बहरूपियों की कला को देख सकें कि कैसे वे अपना काम करते हैं।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप

रंगकर्मी विलास जानवे ने बताया कि बहुरूपी कला एक ऎसी कला है जो लोगों को मन से जोडती है। उनके भीतर दबी हुई भावनाओं और अपेक्षाओं को उजागर करने का मौका देती है इस अनूठी कला के इस मर्म को इस भव्य उत्सव ने उजागर किया। इस मौके पर इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के पूरे परिसर में बहुरूपी कला पर पहली बार फोटोग्राफ, पेन्टिग्स, म्यूरल, मूर्ति कला और इंस्टालेशन कला की प्रदर्शनी भी हुई। इस प्रदर्शनी में दिल्ली के युवा और प्रतिभावान डिजाईनर और फिल्मकार रुपेश सहाय ने तैयार किया और इसकी परिकल्पना में भी उनका सहभाग है ।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप
बाल कलाकार

बहुरूपियों को लेकर जानवे ने बताया कि कृष्ण भगवान की बहुरूपी कलाकार के रूप से हम सभी परिचित हैं। इसे इतिहास के सन्दर्भ में देखें तो राजा महाराजा और बादशाह के दरबारों में बहुरूप धारण करने वाले विशेषज्ञ कलाकारों का जिक्र आता है। जो स्वयं नाना प्रकार के स्वांग रच कर एक ओर अपने शासक का मनोरंजन करते तो दूसरी तरफ उनके लिए जासूसी का भी काम करते।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप

वे अपने शासकों को वेश बदल कर प्रजा का सच्चा हाल जानने को प्रेरित करते तो कभी वेश बदल कर दुश्मन को चकमा देकर उसके चंगुल से आज़ाद भी कराते। राज्याश्रय प्राप्त करने वाली इस कला को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। कालांतर में इस कला को जागीरदारों, निजामों और गांव-कस्बों के सम्पन्न घरों ने प्रश्रय दिया और उसके बाद बहुरूपी कलाकार गांवों, कस्बों और शहरों में बीस पच्चीस दिन का डेरा लगा कर जन साधारण का मनोरंजन करने लगे।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र : 'बहुरुपिया कला' को बचाने के लिए कलाकारों ने धरे अलग-अलग रूप

इतना ही नहीं कुछ चुनिन्दा बहुरूपी कलाकार दिल्ली के कुछ विद्यालयों में गए और अपना प्रदर्शन देकर बच्चों के सामान्य ज्ञान और व्यवहार ज्ञान को भी बढ़ाया।

इस भव्य उत्सव में बहुरूपियों ने अलग-अलग रूप धर कर दिल्लीवासियों का दिल जीत लिया। 7 अक्टूबर को इस शानदार उत्सव का समापन हुआ।

देखिये इस कार्यक्रम का विडियो..

–सागर कुमार 

 

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