पुलिस और महिला आयोग की मिली भगत की बलि चढ़ता मोदी का “महिला सशक्तिकरण”

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दिल्ली : महिला सशक्तिकरण एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही भारत का महिला वर्ग अपनी सुरक्षा और सम्मान के सुनहरे सपने को साकार होने की परिकल्पना करने लगता है. हर सरकार ने अपने-अपने तरीके से देश की महिलाओं को घरेलु अत्याचार से मुक्ति दिलाने के प्रयास किये हैं. भारत की मौजूदा मोदी सरकार भी महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के बड़े-बड़े वादे कर रही है.

पुलिस और महिला आयोग की मिली भगत की बलि चढ़ता मोदी का "महिला सशक्तिकरण"

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भारत की महिलाओं को बहुत आस थी कि मोदी जी के आने के बाद हालात सुधरेंगे लेकिन कहाँ तक पहुंचे हैं हम अपनी ही माताओं और बहनों को लेकर, कहीं सुरक्षा और सम्पन्नता का सपना दिखा के हम उन्हें और कमज़ोर तो नहीं कर रहे? हालिया मामला गाज़ियाबाद के वैशाली का है जहाँ सास ससुर ने बेटे के साथ मिलकर अपनी बहु को घर से बहार निकाल दिया. आज शादी के 1२ साल बाद एक बच्ची को जन्म देने के बाद वो कौन से हालात थे जिन्होंने इस महिला के सर से छत छीन ली.

यह कहानी है कामना गुप्ता की जिनकी शादी 20 जून 2005 को उत्तर प्रदेश के वैशाली गाज़ियाबाद जिले के एक संयुक्त परिवार के विकास गुप्ता (पुत्र श्री जय कुमार गुप्ता और शशी गुप्ता) से ये सोच कर करी थी कि संयुक्त परिवार में उनकी बेटी ख़ुशहाल व सुरक्षित रहेगी और दुःख तकलीफ में उसको सँभालने के लिए घर के बड़े उसके साथ होंगे. शादी से पहले रहने के लिये घर का मकान और आमदनी के रूप में एक चलता हुआ कंप्यूटर इंस्टिट्यूट लड़की के घरवालों को दिखाया गया था. जल्दबाजी में शादी हुई और जल्दी ही सारी सच्चाई सामने आने लगी. दहेज़ में कम पैसे लेने और इसके जैसी अन्य प्रार्थनाओं का सामना कामना कर ही रही थी कि पता चला जिस कंप्यूटर इंस्टिट्यूट को उन्हें दिखाया गया था वो उनका नहीं है.

पता चला विकास गुप्ता न तो कुछ करते हैं और न ही भविष्य में कुछ करने की उम्मीद है. इस पर भी चुप रह और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेवारी समझ कामना एक स्कूल में नौकरी करने लगी. जल्दी ही एक बेटी को जन्म दिया और उसकी जिम्मेवारी निभाने लगी. लालच में डूबे इस गुप्ता परिवार ने इतना करने पर भी और बेटी पैदा करने के ज़ुल्म में कामना पर ज़ुल्म और बढ़ा दिए. रोज़ सुबह शाम चरित्र पर इलज़ाम और गालियों का नया दौर शुरू हुआ. इस पर भी वो अपनी बेटी के लिये सब सहती रही शायद यही उसकी गलती थी. इस की ही सजा उसे 7 महीने पहले पति की मार के रूप में मिली. झगडा इतना बड़ा की उसे घर से बाहर निकाल दिया गया.

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अब शुरू हुई भारत में महिला सशक्तिकरण की ये कहानी, कामना ने पुलिस में रिपोर्ट की जहाँ घरेलु झगडा बताते हुए तो पहले पुलिस ने मामला रफा दफा करने की कोशिश की लेकिन मौके पर लोगों के जमा होने से पुलिस ने 2 पुलिस कर्मी उसके साथ भेज दिये. घर पहुँचने पर पुलिस के सामने दोबारा जान से मारने की धमकी दी गई तो पुलिस यह कहते हुए कि “आप यहाँ सुरक्षित नहीं हैं और हम सुरक्षा नहीं दे सकते” कह के हाथ झाड लिये. हालात से मजबूर इस लड़की ने अपने माँ-बाप के घर सहारा लिया.

उत्तर प्रदेश और दिल्ली महिला आयोग में इंसाफ की गुहार लगाई लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ तो राष्ट्रीय महिला आयोग का दरवाज़ा खटखटाया. बकौल कामना गुप्ता “गत 23 मार्च 2018 को मेरी राष्ट्रीय महिला आयोग में तारिख थी. वहां पर मेरे पति के अलावा वसुंधरा (गाज़ियाबाद) थाने के SO श्री धर्मेन्द्र चौहान जी को भी बुलाया गया था. बातचीत में मुझसे पूछा गया कि मै महिला आयोग और पुलिस से किस तरह की मदद चाहती हूँ.

मैंने गुज़ारिश की कि मुझे मेरे ससुराल में ( जहाँ से मुझे 6 महीने पहले निकाल दिया गया था ) वापस स्थापित किया जाए ताकि मै अपनी 11 साल की बच्ची के साथ वहां रह सकूँ. मेरे पति विकास गुप्ता से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि, “ मेरे माँ बाप कामना को घर में नहीं रखना चाहते.” मान्यवर, इन सब बातों के तहत मेरे पति ने एक प्रस्ताव रखा कि, “मैंने अभी अभी नया काम शुरू किया है और मेरी कमाई सिर्फ 3 से 5 हज़ार रुपय है. कामना बहुत अच्छा कमा लेती है. मै एक किराए का घर ले कर कामना और अपनी बच्ची के साथ रहने को तैयार हूँ.” इस बात की राष्ट्रीय महिला आयोग की काउन्सलर्स नेहा महाजन गुप्ता और SO श्री धर्मेन्द्र चौहान जी ने पुरजोर सराहना की.

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मेरे इस दलील पर कि जब मेरे पति अपनी घर की छत की नीचे रहते हुए भी 13 साल बाद भी आज ये कह रहे है कि मेरी कोई फिक्स्ड इनकम नहीं है और मुश्किल से 3 से 5 हज़ार रूपए कमा पा रहा हूँ. इन सब बातों के मददेनज़र मै किस प्रकार परिवार से अलग होकर अपने पति के साथ अकेले रह सकती हूँ ? जो पति मुझे 13 साल तक शाररिक और मानसिक प्रताड़ना देता आया है और 11 सितम्बर 2017 को भी क्रिकेट बैट से मुझे मारना चाहता था, और जिसने आज तक अपनी कोई भी वित्तीय जिम्मेवारी ना संभाली हो (वरन मेरा सैलरी एकाउंट का डेबिट कार्ड हमेशा अपने हाथ में रखा और बैंकों के क्रेडिटकार्ड पर पैसे उठा कर मेरे सर पर चुकाने के लिए डालते रहे), उसके साथ मै अपने ससुराल से अलग हो कर एक किराये के घर में अकेले रहने की हिम्मत कैसे कर सकती हूँ.

और जब मै इस विसंगत और अव्यवहारिक प्रस्ताव को न स्वीकार करती हूँ तो राष्ट्रीय महिला आयोग की काउन्सलर्स नेहा महाजन गुप्ता और वसुंधरा (गाज़ियाबाद) थाने के SO श्री धर्मेन्द्र चौहान जी मुझे दोषी क्यों ठहरा रहे है? आज आयोग में जब यह बात रखी गयी की एक बार मेरे सास ससुर को भी बुला कर बात कर लेते है तो SO श्री धर्मेन्द्र चौहान जी ने कहा कि मै उनसे बात कर लूँगा और काउन्सलर्स नेहा महाजन गुप्ता ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर बिना उस बातचीत के निष्कर्ष का इंतज़ार कर मेरा केस वहां से बंद कर दिया. क्या महिला आयोग की कार्यवाही आयोग के संरक्षण के तहत ही नहीं होनी चाहिए थी? राष्ट्रीय महिला आयोग ने पहली ही तारिख पर गाज़ियाबाद के SO चौहान के कहने पर यह कह कर उस का केस बंद कर दिया कि वह अपने सास ससुर का घर हड़पना चाहती है.”

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हमने जब कामना की गुहार पर जानकारी हासिल करने की होशिश की तो SO धर्मेन्द्र चौहान और राष्ट्रीय महिला आयोग दोनों ने ही इस विषय पर अपना पक्ष बताने से मना कर दिया. गौरतलब ये है कि गाज़ियाबाद के SO श्री धर्मेन्द्र चौहान जिन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही अपना पदभार संभाला है वह इस परिवार की समस्याओं पर इतनी गहरी जानकारी किस आधार पर रखते हैं? सवाल महिला आयोग पर भी उठता है कि बिना किसी पहलु को देखे समझे चंद ही मिनटों में कैसे आप इतने संवेदनशील मामलों पर इतने अव्यवहारिक फैसले सुना देते हैं! सूबे की बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद ही महिलाओं के उत्पीडन को रोकने के लिए अपने संकल्प पत्र का ज़िक्र किया था।

उन्होंने जनता से वादा किया था कि भाजपा के संकल्प पत्र में महिला सुरक्षा पर जो वादा किया गया था वह पूरा होगा। लेकिन ज़मीनी तौर पर योगी सरकार इस मुद्दे पर आंख ही मूंदे बैठी है. उत्तरप्रदेश ही नहीं दिल्ली महिला आयोग भी सहायता देने में विफल ही दिखा है.

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दिल्ली की “आप” सरकार के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भले ही मंचों पर महिला सुरक्षा और सशक्तिकरण की कितनी ही दुहाई देते फिरे पर यहाँ भी ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है! राष्ट्रीय महिला आयोग का हाल इनसे भी बुरा मिला, राष्ट्रीय महिल आयोग ने राज्य महिला आयोग से २ कदम आगे जाते हुए पीड़िता की बात तो सुनना दूर उसे ही अपराधी घोषित करने की तैयारी कर रक्खी है.

जब राष्ट्रीय महिला आयोग का हाल इतना ख़राब है तो राज्य के आयोग किस कदर दुर्गति को प्राप्त होंगे इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. सोचने की बात यह है कि कही देश में बढ़ रही महिलाओं के प्रति अपराध की प्रवृति और पूरे राष्ट्र में कमज़ोर होती — और इसके जैसी अनेक ज्यादतियों को झेलने को मजूर इन महिलाओं के पीछे कही ऐसे ही पुलिस के इंस्पेक्टर और महिला आयोग के पदाधिकारी तो नहीं? जबतक ऐसे लोगों के खिलाफ कोई सख्त कदम नहीं उठाया जायेगा तब तक ऐसी ही हज़ारों कामनाएँ रोज़ अपने घरों से निकाली जाती रहेंगी और हम कैंडल मार्च निकालते सड़कों पर मातम मानते रहेँगे

–सागर कुमार 

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