रामजन्मभूमि को लेकर मोदी सरकार ने उच्चतम न्यायालय से कर डाली ये बड़ी मांग! जिससे विरोधियों में मची खलबली…

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This great demand from the Supreme Court of the Modi Government about Ramjanmabhoomi! There was a stir in the opponents (नई दिल्ली) : इस बात को हम भलीभांति जानते हैं कि ‘राम जन्मभूमि’ का मामला ‘उच्चतम न्यायालय’ में है. जिसको लेकर न्यायालय फैसला साफ नहीं कर रहा है कि इसी बीच ‘मोदी सरकार’ ने राम जन्मभूमि को लेकर एक बड़ा दांव चला है. जिसके बाद विपक्षियों में हलचल पैदा हो गई है.

विवादित भूमि को लेकर मोदी सरकार ने उच्चतम न्यायालय से कर डाली ये बड़ी मांग! जिससे विरोधियों में मची खलबली...

सूत्रों की माने तो ‘मोदी सरकार’ ने अयोध्या विवाद मामले में विवादित जमीन को छोड़कर बाकी की जमीन को राम जन्मभूमि को लौटाने और इस पर जारी यथास्थिति को हटाने की मांग जबरदस्त मांग की है. केंद्र सरकार ने अपनी अर्जी में 67 एकड़ जमीन में से कुछ हिस्सा सौंपने की मांग की है. आपको बता दें कि यह 67 एकड़ जमीन 2.67 एकड़ विवादित जमीन के चारो तरफ स्थित है. सरकार के इस फैसले का ‘हिंदूवादी संगठनों’ और ‘विश्व हिंदू परिषद्’ ने स्वागत किया है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि साल 1993 में केंद्र सरकार ने अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम बनाकर विवादित भूमि और उसके आसपास की जमीन का अधिग्रहण किया था. इसके अलावा इससे पहले से जमीन विवाद को लेकर दाखिल सभी याचिकाओं को खत्म कर दिया था. सरकार द्वारा बनाए गए इस अधिनियम को ‘उच्चतम न्यायालय’ में चुनौती दी गई थी. उस समय सुनवाई के दौरान अदालत ने 1994 में तमाम दावेदारी वाली अर्जियों को बहाल कर दिया था.

विवादित भूमि को लेकर मोदी सरकार ने उच्चतम न्यायालय से कर डाली ये बड़ी मांग! जिससे विरोधियों में मची खलबली...
नरेंद्र मोदी

न्यायालय ने जमीन को केंद्र सरकार के पास रखने के लिए कहा था और यह निर्देश देते हुए कहा था कि जिसके पक्ष में फैसला आएगा उसे ही जमीन दी जाएगी. रामलला विराजमान तरफ से वकील ऑन रिकॉर्ड ‘विष्णु जैन’ ने कहा था कि दोबारा कानून लाने पर कोई रोक नहीं है लेकिन उसे ‘उच्चतम न्यायालय’ में चुनौती दी जा सकती है. 

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इस मामले को लेकर मुस्लिम पक्ष के वकील ‘जफरयाब जिलानी’ ने कहा था कि साल 1993 में जब अयोध्या अधिग्रहण अधिनियम लाया गया था तब उसे अदालत में चुनौती दी गई थी. अदालत ने तब यह व्यवस्था दी थी कि अधिनियम लाकर अर्जियों को खत्म करना गैर संवैधानिक है.

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उच्चतम न्यायालय

सूत्रों की माने तो अर्जी पर पहले अदालत फैसला ले और तब तक जमीन ‘केंद्र सरकार’ के संरक्षण में ही रहे. जिससे जिसके हक में अदालत फैसला सुनाती है सरकार जमीन को उसके सुपुर्द कर दे.

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